कविता - ओस

कविता: ओस

- सोहनलाल द्विवेदी

कविता का उद्देश्य

छात्रों को ईश्वर की अनोखी रचना यानी प्रकृति से पहचान कराकर उसके महत्व को समझाना।

सरल अर्थ

हरी घास पर बिखेर दी हैं ये किसने मोती की लड़ियाँ?
कौन रात में गूँथ गया है ये उज्ज्वल हीरों की कड़ियाँ?
मतलब: कवि पूछते हैं कि सुबह हरी घास पर मोतियों जैसी ओस की बूंदें किसने बिछा दीं? रात में किसने हीरे जैसी चमकती ओस की लड़ियाँ बना दीं? ओस बहुत सुंदर लगती है।
जुगनू से जगमग-जगमग ये कौन चमकते हैं यों चमचम?
नभ के नन्हे तारों से ये कौन दमकते हैं यों दमदम?
मतलब: ये ओस की बूंदें जुगनू की तरह जगमगा रही हैं। आसमान के छोटे तारों की तरह चमक-दमक रही हैं। धूप पड़ने पर ओस बहुत चमकती है।
लुटा गया है कौन जौहरी अपने घर का भरा खज़ाना?
पत्तों पर, फूलों पर, पग-पग बिखरे हुए रतन हैं नाना।
मतलब: लगता है कोई जौहरी अपना खजाना लुटा गया है। क्योंकि पत्तों, फूलों और हर कदम पर कीमती रत्नों जैसी ओस की बूंदें बिखरी हैं।
बड़े सवेरे मना रहा है कौन खुशी में यह दिवाली?
वन-उपवन में जला दी है किसने दीपावली निराली?
मतलब: सुबह-सुबह ऐसा लगता है जैसे जंगल और बगीचे में दिवाली मनाई जा रही है। ओस की बूंदें दीयों की तरह चमक रही हैं। ये अनोखी दीपावली किसने जलाई?
जी होता, इन ओस कणों को अंजलि में भर घर ले आऊँ।
इनकी शोभा निरख-निरख कर इन पर कविता एक बनाऊँ।
मतलब: कवि का मन करता है कि इन ओस की बूंदों को हाथों में भरकर घर ले जाएँ। इनकी सुंदरता को बार-बार देखकर इन पर एक कविता लिखें।

कविता का संदेश / शिक्षा

  • प्रकृति प्रेम: ओस भगवान का दिया हुआ अनमोल तोहफा है। ये मोती, हीरे, रत्नों जैसी सुंदर है।
  • ईश्वर की रचना: ये सुंदरता भगवान ने बनाई है। हमें इसकी कदर करनी चाहिए।
  • प्राकृतिक सौंदर्य: सुबह की ओस दिवाली जैसी खुशी देती है। हमें प्रकृति की छोटी-छोटी चीजों में भी सुंदरता देखनी चाहिए।

सार: यह कविता बताती है कि ओस कोई साधारण पानी नहीं है। यह प्रकृति का खजाना है जो हमें खुशी और सुंदरता देता है।